केवली कुंभक प्राणायाम बिंदु पर विजय प्राप्त कर समाधि की और अग्रसर करता हैं:- योगाचार्य महेश पाल
केवली कुंभक प्राणायाम बिंदु पर विजय प्राप्त कर समाधि की और अग्रसर करता हैं:- योगाचार्य महेश पाल
गुना -केवली कुंभक प्राणायाम की एक उच्च अवस्था है, केवली कुंभक का अर्थ है साँस को रोकना । मन को विचारों से रहित करना, योगाचार्य महेश पाल इस प्राणायाम के बारे में विस्तार से समझाते की केवली कुंभक प्राणायाम घेरंड संहिता में वर्णित 8 प्राणायाम में से एक है, कुंभक दो प्रकार का होता है, सहिता और केवल। जो सांस लेने और छोड़ने के साथ जुड़ा होता है उसे सहिता कहा जाता है। जो इनसे रहित है उसे केवल (अकेला) कहते हैं। जब आपको सहिता में महारत हासिल हो जाती हैं तब केवली कुंभक् के लिए प्रयास किये जाते हैं, केवली कुंभक् आध्यात्मिक मिलन, या समाधि का अंतिम चरण माना जाता है । केवल कुम्भक का अर्थ केवल सांस लेने या छोड़ने के बीच सांस को रोकना नहीं है। इसे प्राण को सांस लेने और छोड़ने की गतिविधियों से पूरी तरह अलग रखने वाला माना जाता है, और यह सांस का एक बिना रुके रुकना है जो प्राणायाम के माध्यम से प्राप्त समाधि अवस्था के भीतर होता है। योगियों का मानना है कि केवल कुम्भक शरीर के भीतर मौजूद प्राण को प्रभावित करता है, जिससे स्वयं के भीतर जीवन शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है,साधक पूर्ण एकाग्रता से त्रिबन्ध सहित प्राणायाम के अभ्यास द्वारा केवली कुम्भक से पुरुषार्थ सिद्ध होता है उसकी व्यापकता बढ़ जाती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर इन छः शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। केवली कुम्भक सिद्ध होने पर उस योगी के लिए तीनों लोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। कुण्डलिनी जागृत होती है, शरीर पतला हो जाता है, मुख प्रसन्न रहता है, नेत्र मलरहित होते हैं सर्व रोग दूर हो जाते हैं । बिन्दु पर विजय होती है । जठराग्नि प्रज्वलित होती है।केवली कुंभक प्राणायाम के अभ्यास से हमारा मन एक जगह स्थिर होता है अंत:करन मैं चित्र में उठने वाले विचार शांत होते ब्रह्मचर्य स्थापित होता है एवं बिंदु उधर्वगामी होकर ऊर्जा के रूप मैं मूलाधार से होते हुए आज्ञाचक्र और सहस्रार चक्र तक ऊर्जा नीचे से ऊपर की ओर उठती है जिससे कुंडलिनी शक्ति का विकास होता ध्यान में प्रांगण होकर समाधि की ओर बढ़ जाते हैं, केवली कुंभक् प्राणायाम का अभ्यास करने के लिए सबसे पहले स्वच्छ तथा उपयुक्त वातावरण में सिद्धासन में बैठ जाएं। अब दोनों नाक के छिद्र से वायु को धीरे-धीरे अंदर खींचकर फेफड़े समेत पेट में पूर्ण रूप से भर लें। इसके बाद क्षमता अनुसार श्वास को रोककर रखें। फिर धीरे धीरे से सांस को छोड़ दे इस प्रकार 5 मिनिट तक इस अभ्यास को करे इस प्राणायाम के अभ्यास के कई प्राप्त होते हैं, आयु में वृद्धि होती है, शरीर निरोग रहता है , भूँख - प्यास, शर्दी - गर्मी, और अनेक द्वन्दों से मुक्त मिलती है, ध्यान में दृढ़ताआती है , दिव्य दृष्टि का विकास होता है, विंदु पर विजय प्राप्त होती हैं इस प्राणायाम के अभ्यास को करते समय हमें कुछ विशेष सावधानियां रखनी चाहिए हृदय रोग, अनियंत्रित उच्च रक्तचाप या उच्च रक्तचाप, मस्तिष्क धमनीविस्फार और मानसिक विकारों से पीड़ित लोगों के लिए यह प्राणायाम वर्जित है।




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