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राष्ट्रधर्म के लिए किया गया संघर्ष महाराणा की अमिट पहचान बना- कैलाश मंथन

राष्ट्रधर्म के लिए किया गया संघर्ष महाराणा की अमिट पहचान बना- कैलाश मंथन

महाराणा ने घास की रोटी खाना मंजूर किया, लेकिन मुगल साम्राज्य की दासता स्वीकार नहीं की- कैलाश मंथन

महाराणा प्रताप की जयंती पर चिंतन गोष्ठी आयोजित


गुना। वर्तमान में भारत में महाराणा प्रताप के महान चरित्र से भारतीय समाज को प्रेरणा लेना चाहिए। समय का सर्वश्रेष्ठ उपयोग भारतीय संस्कृति के महान पुरूषों के श्रेष्ठ जीवन चरित्र का चिंतन हो सकता है। चिंतन मंच के तहत भारतीय संस्कृति के उन महान वीर योद्धाओं, अवतारों एवं संतों की गाथाओं का यशोगान करते हुए वार्ता प्रसंग एवं बौद्धिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में रविवार को देश के महापराक्रमी योद्धा महाराणा प्रताप की जयंती के अवसर पर सर्राफा बाजार स्थित चिंतन हाउस में महाराणा प्रताप के जीवन प्रसंग पर विचार गोष्ठी आयोजित हुई। इस अवसर पर चिंतन मंच के प्रमुख कैलाश मंथन ने कहा कि धर्म एवं स्वाधीनता के लिए महाराणा प्रताप का ज्योतिर्मय बलिदान भारतीय इतिहास के पृष्ठों में लिखी अमिट गाथा है। मुगल साम्राज्य के तहत अकबर के साम्राज्यवादी मंसूबों को ध्वस्त करने वाले महाराणा प्रताप की शौर्य गाथा का चिर गवाह है चित्तौडगढ़ का विजय स्तंभ। श्री मंथन ने कहा कि हल्दी घाटी की पावन बलिदान भूमि में महाराणा के शौर्य एवं तेज की भव्य गाथा से इतिहास के पृष्ठ रंगे हैं। महाराणा का देश धर्म स्वाधीनता के लिए किया गया संघर्ष भारत की सनातन संस्कृति के लिए मिसाल बन गया है। 

गोष्ठी में श्री मंथन ने आगे कहा कि महाराणा ने मुगलों की दासता स्वीकार नहीं की। उन्होंने अकबर को तुर्क ही कहा, बादशाह नहीं। महाराणा का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल 3 के दिन मेवाड की पवित्र भूमि में हुआ था। महाराणा सांगा के पौत्र महाराणा प्रताप 1 मार्च सन 1573 को सिंहासनासीन हुए। उस समय राजपूतों के अधिकांश राजा मुगल साम्राज्य की आधीनता स्वीकार कर चुके थे। लेकिन महाराणा ने आधीनता स्वीकार नहीं की। संवत 1633 श्रावण में हल्दी घाटी का रक्त रंजित युद्ध हुआ। चित्तौड़ को मुगलों की सेना ने भस्म कर दिया, लेकिन महाराणा झुके नहीं। उन्होंने वनवास किया, महारानी एवं सुकुमार राजकुमारी और कुमार के साथ घास की रोटियां खाना मंजूर किया। अरावली की गुफाओं में रहे, पत्थरों की सेज पर सोए। अकबर चाहता था प्रताप आधीनता स्वीकार कर लें लेकिन महाराणा ने मुगलों की आधीनता स्वीकार नहीं की। 

#दानवीर भामाशाह के सहयोग से गठित किया सैन्य बल और जीते कई दुर्ग

श्री मंथन ने कहा कि मेवाड के गौरव दानवीर भामाशाह के सहयोग से महाराणा ने सैन्य बल गठित कर दुर्गों को जीता और उदयपुर को राजधानी बनाकर अपने 25 वर्षों के शासन में उन्होंने केशरिया पताका ऊंची रखी। चित्तौड के उद्धार के पूर्व रात में भोजन, सैया पर शयन दोनों मेरे लिए वर्जित रहेंगे। इस प्रतिज्ञा के साथ महाराणा प्रताप ने वि.स. 1653 माघ शुक्ल 11 को परमधाम गमन किया। उनके सामने वीर राजपूतों ने मुगल साम्राज्य को ध्वस्त करने एवं सनातन संस्कृति की रक्षा करने की कसम दोहराई। ध्यान रहे चिंतन मंच के तहत अवतारों एवं महापुरूषों के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालने के लिए चिंतन गोष्ठियों का लगातार आयोजन किया जा रहा है।

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