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महर्षि भृगु ज्योतिष एवं कृषि विद्या के सर्जक-कैलाश मंथन

महर्षि भृगु की जयंती पर हुई चिंतन गोष्टी

महर्षि भृगु ज्योतिष एवं कृषि विद्या के सर्जक-कैलाश मंथन


गुना। महर्षि भृगु ज्योतिष, कृषि आदि अनेक विधाओं के सर्जक तथा सप्तऋषियों में एक महृषि, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र, भृगु संहिता के रचयिता, परम ज्ञाता भारत के वैदिक एवं पौराणिक इतिहास में परम पूजनीय हैं । चिंतन मंच के संयोजक समाजसेवी कैलाश मंथन ने महर्षि भृगु की जयंती पर मंगलवार को चिंतन मंच गोष्ठी श्रृंखला में कहा सप्तऋषियों में से एक  पू. महर्षि भृगु के संदर्भ में भगवान कृष्ण ने कहा था - ‘‘महर्षीणां भृर्गुःअहं’’। भगवान कृष्ण कहते हैं महर्षियों में सर्वश्रेष्ठ ऋषु भृगु ऋषि मैं हूँँ।

 पौराणिक साहित्य में सप्तऋषि होने के साथ-साथ महर्षि भुगु की गणना ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में भी होती है। महर्षि भृगु के धाता-विधाता नाम के पुत्र थे तथा विष्णु भगवान की धर्मपत्नी लक्ष्मी जी उनकी सुपुत्री थीं। वह अत्यंत तेजस्वी, महान ज्ञाता और अग्नि तथा कृषि के जनक तथा मंत्रदृष्टा ऋषि भी थे। विराट हिंदू उत्सव समिति के प्रमुख कैलाश मंथन ने विचार व्यक्त करते हुए कहा

 महर्षि ऋचीक, महर्षि जमदग्नि, भगवान परशुराम जी तथा संजीवनी विद्या के ज्ञाता एवं असुरों के गुरू शुक्राचार्य जी भी उनकी संतानें थीं, महर्षि च्यवन, मृकण्डू तथा मार्केण्डेय आदि भी महर्षि भृगु की ही संतान थे। महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की भी ऋषि-मुनियों के कहने पर परीक्षा ली थी, इस कारण उनकी बेटी लक्ष्मी जी नाराज हो गई थीं और श्राप दिया था कि ब्राह्मणों के घर में लक्ष्मी जी निवास नहीं करेंगी तब महर्षि भृगु ने भृगु संहिता रचने की घोषणा कर कहा था कि भृगु संहिता का अध्ययन कर ब्राह्मण ज्योतिषाचार्य बनेंगे और द्रव्य, दक्षिणा के रूप में धनलक्ष्मी विप्र देवताओं के चरणों में अर्पित प्रेषित की जावेगी और भगवान विष्णु ने भृगु जी का सम्मान करते हुए उदारता और महानता का व्यवहार करते हुए उनके श्रीचरण को जीवन भर पर अपने हृदय में स्थापित कर लिया। यह घटना हमें साहस संकल्प और उदारता तथा मर्यादा का ध्यान रखने की प्रेरणा देती है। भृगु चरित्र पर प्रकाश डालते हुए श्री मंथन ने कहा भृगु कच्छ वर्तमान में भरूच (गुजरात), पवित्र नर्मदा नदी एवं कच्छ की खाड़ी सिंधुसागर के संगम पर महर्षि भृगु का विशाल आश्रम था और आज भी मंदिर स्थित है इसके साथ ही उन्होंने नर्मदातट (म.प्र.), गंगा और सरजू नदी संगम स्थल पर, तटों पर बलिया (उ.प्र.) को भी अपनी तपस्थली और कर्मस्थली बनाया था।  स्वामी थिरूनीर्ममलाई, त्रिरूमाला, नांगुनेरी, नन्नारगुडी, कांचीपुरम आदि दक्षिण भारत के भी कई धार्मिक स्थल महर्षि भृगु से संबंधित हैं।हरियाणा के नारनौल जिले तथा राजस्थान के झुंझनु जिले की सीमा पर स्थित ढोसी गांव में भी उनके और उनके वंशजों से संबंधित हैं और अनेक कथाऐं प्रचलित हैं।उपनिषदों के श्लोक भी महर्षि भृगु ने लिखे या कहे थे, ऐसा कहा जाता है। भृगु संहिता सहित अनेक ग्रंथों की रचना महर्षि भृगु ने की थी। देश के प्रसिद्ध साहित्यकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के.एम. मुंशी) जिन्होंने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए भी कार्य किया, महर्षि भृगु के संबंध में और भृगुवंश के संबंध में बहुत किताबें लिखी हैं। आज भी भरूच (गुजरात) में महर्षि भृगु का मंदिर है। चिंतन हाउस में संभ्रान्तर जनों के बीच महर्षि के महान चरित्र पर विचार विमर्श हुआ इसमें अनेक विप्रजनों ने हिस्सेदारी की।

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